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सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

रोहित सरदाना तुम हो किसकी तरफ?

आज सुबह सुबह अरविंदजी का एक वीडियो आया जिसमे उन्होंने कुछ दिनों पहले हमारी सेना द्वारा किये गए सर्जिकल स्ट्राइक की प्रशंसा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते हुए कहा की मैं उन्हें सल्यूट करता हूँ।

ज्ञात रहे विधानसभा के विशेष सत्र में भी आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार के सभी विधायको/मंत्रियो ने भारत सरकार के इस कदम की सराहना करते हुए, हमारे देश की सेना, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, सभी सेनाध्य्क्षो और भारत की जनता को बधाई सम्बंधित विधेयक भी पारित किया था।

लेकिन कुछ दिनों से जिस तरह पाकिस्तान विदेशी मिडिया को लेकर इस बात का भ्रम फैला रहा है की भारत ने ऐसा कुछ नहीं किया तो देश में बैठे हर देशभक्त के सीने में आग लगती है की कैसे कोई देश हमारे सैनिको की इस बहादुरी को झूंठा बता सकता है, वो नकारते रहे वो उनकी प्रॉब्लम है पर यदि विदेश मिडिया तक ये कहने लग जाए की भारत झूठ बोल रहा है तो हर देशभक्त का खून खौलने लग जाना चाहिए। हमारे सैनिक जो अपनी जान की परवाह किये बिना दुश्मन देश में घुसकर उसी की धरती पर उसे सबक सिखाकर आये जिससे हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हुआ और आज यदि पाकिस्तान के साथ साथ विदेशी मीडिया (CNN वीडियो लिंक) भी ये कहने लग जाए की भारत झूठ बोल रहा है तो ये मेरे उन बहादुर सैनिको की बहादुरी का अपमान है ऐसे में एक सच्चे देशभक्त का कर्तव्य बनता है की वो सारे फुटेज (जो की भारत सरकार कह रही है की हमने पूरी कार्यवाही को ड्रोन से फिल्माया भी है) को पाकिस्तान और इन विदेशी मीडिया के मुँह पर दे मारना चाहिए जिससे हमारे सैनिको का सीना भी गर्व से और चौड़ा हो।

सोचिये जब भारत वो वीडियो सबके सामने रखेगा तो उन तमाम विदेशी मिडिया की कितनी किरकिरी होगी, वो भारत के सामने नजर मिलाने लायक नहीं रहेंगे।

पर अरविंदजी के ऐसा कहने पर कुछ लोगो को बहुत दर्द हुआ (आप समझ रहे होंगे पाकिस्तानियों को? नहीं भाई पाकिस्तानियों को नहीं कुछ लोग हमारे ही देश में मौजूद है जिन्हें दर्द हुआ की अरविंदजी ने पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब करने की बात कैसे की) इनमे से एक है रोहित सरदाना

कहने को तो रोहित सरदाना भारतीय है और एक पत्रकार भी है लेकिन वो क्यों पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब नहीं करने देना चाहता? आखिर रोहित तुम हो किसकी तरफ जिस देश की धरती पर सांस ले रहे हो उसकी तरफ या उस झूंठे पाकिस्तान की तरफ?

तुमने सवाल किया की अरविन्द जी ने CNN पर सवाल क्यों नहीं किया? अरविन्द जी सवाल नहीं अरविन्दजी ने तो पूरे यकीन के साथ कहा है की वो झूठ बोल रहे है(दुबारा सुनना एक बार अरविन्द का वीडियो) और उसी के झूठ को बेनकाब करने की मांग देश के प्रधानमंत्री जी से कर रहे है। लेकिन तुम्हारे पास तो टीवी स्टूडियो है तुमने क्या किया CNN को बेनकाब करने के लिए? अरविन्द जी के वीडियो पर 3-4 ट्वीट भी कर दिए, एक लंबी छोड़ी पोस्ट लिख डाली, स्पेशल शो कर रहे हो अरविन्द की बात को गलत तरीके से पेश कर भारत के लोगो में जहर भरने के लिए लेकिन एक भारतीय न्यूज़ चेनल होने के नाते जब दुनिया का कोई चेनल मेरे देश की सेना की बहादुरी पर ऊँगली उठा रहा है तो उस चेनल का झूठ दुनिया को दिखाने के लिए तुमने क्या किया? यो तो सोमनाथ भारती के कुत्ते तक पूरे पूरे दिन टीवी स्टूडियो में बहस करते रहते हो आम आदमी पार्टी को बदनाम करने के लिए लेकिन आज पाकिस्तान के झूठ और विदेशी मिडिया के झूठ को दुनिया के सामने लाने के लिए तुमने क्या किया?

थोड़ा बहुत जमीर यदि अभी भी ज़िंदा है तो अपने आप से सवाल जरूर पूछना रोहित सरदाना तुम हो किसकी तरफ? 

राम किरोड़ीवाल

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

अपाहिज होते पत्रकार

एक समय था जब पत्रकार और पत्रकारिता अपने दम पर बड़े बड़े सिंहासन हिला देती थी, जब एक पत्रकार अपना कैमरा नेताओं की तरफ घुमाकर सवाल के लिए मुहँ खोलता था तो उससे पहले नेताजी मुँह फिराकर भागने की सोचने लग जाते, की कही ये कोई सवाल कर लगा तो क्या जवाब देंगे।

तब नेता कैमरे का सामना करने की हिम्मत तभी करते थे जब उन्होंने सच में बहुत अच्छा काम कर दिया होता था। जब इतनी ताकत थी मीडिया के उस कैमरे और पत्रकार की कलम में तो आज फिर क्यों पत्रकार की कलम और मिडिया का कैमरा अपने आप में लाचार बेबस सा नजर आने लगता है?

सभी पत्रकार और संवाददाता तब भी किसी ना किसी दल के समर्थक होते थे पर उस समय उनमे भक्ति नहीं होती थी, उन्हें अपने राजनैतिक झुकाव से कहीं ज्यादा अपने दावित्य अपनी जिम्मेदारियों का ख्याल रहता था, हाँ कोई कोई तब भी अपवाद निकल जाता था पर आजकल तो पत्रकारिता को सही मायने में ज़िंदा रखने वाले एक अपवाद के तरह मिलते है।

जब से टीवी स्टूडियों के एंकर सवाल करते करते अचानक से खुद को प्रवक्ता समझ जिस दल के प्रति उनका रुझान होता है उसकी तरफ से सवाल करना शुरू करते करते धीरे धीरे अपने एंकर वाले पद से प्रवक्ता पद पर आकर उसी दल की तरफ से राज्य सभा में मंत्री या लोकसभा की टिकट हासिल करने लगे तब से कमोबेश हर तरफ टीवी स्टूडियों में बैठे एंकर अंदर ही अंदर ये चाहत रखने लग गए की वो गया है तो हम भी जा सकते है और इसी चाहत को बल देने  के लिए अपने दावित्व को भूल उस दल विशेष के प्रति काम करना शुरू कर देते है और यही से शुरुआत होती है अपने शक्तियों को कम करने की, उस शक्तिशाली कैमरे को कमजोर करने की।
और ये फिर यहाँ तक ही सिमित नहीं रहता फिर वो अपनी चापलूसी और उस दल विशेष के प्रति अपनी आगाध शृद्धा को और मजबूत बनाने के लिए अपने ही पेशे में किसी अन्य एंकर के सवाल पर भी सवाल खड़े करने लग जाता है, उस दल विशेष से किये गए किसी भी एंकर के सवाल को तोड़ मरोड़ कर अपने टीवी स्टूडियों में पेश कर दूसरे एंकर की फजीहत करना ये लोग अपना परम कर्तव्य समझने लगते है और ऐसा करते करते हो वो एकदम से भूल जाते है की वो नेता नहीं एक जिम्मेदार पत्रकार/सवांददाता/एंकर है।

जब आप भूल जाते है की आप क्या है तो स्वतः ही आपकी सभी शक्तियाँ भी समाप्त हो जाती है जैसे पवन पुत्र हनुमान अपनी भूल गए थे की वो कौन है तो वो अपनी शक्तियाँ भी भूल गए थे फिर सभी वानरों ने उनकी स्तुति कर उन्हें उनकी शक्तियाँ याद दिलाई तो वही हनुमान जी जो समुद्र को देखकर ही डर रहे थे एक छलांग में की योजन लांघ गए थे।

कई बार तो मन में प्रश्न आता है की जब एक पुलिसकर्मी अपनी जिम्मेदारी का सही तरीके से पालन नहीं करता तो उसे नौकरी से हटा दिया जाता है, किसी शिक्षक का परीक्षा परिणाम थोड़ा कम रहने पर उसे हजार सवालों का जवाब देना होता है, यहां तक की सीमा पर अपनी जान की परवाह किये बगैर हमारी सुरक्षा करने वाले सैनिकों से भी थोड़ी सी गलती पर उन्हें बड़ी से बड़ी सजा दे दी जाती है तो फिर ये पत्रकार/संवाददाता/एंकर जब अपना काम सही तरीके से नहीं करते है तो फिर इन्हे कोई सजा क्यों नहीं देता? क्यों इन्हे इनके पद पर बने रहने  दिया जाता है?

पत्रकारिता का विद्यार्थी तो नहीं रहा कभी पर इतना तो जानता हूँ की

"एक पत्रकार का कर्तव्य सत्ता से सवाल करना होता है सत्ता के गुणगान करना नहीं" 


जब तक इस देश का एक भी नागरिक भूखा सोता है, एक भी बच्चा शिक्षा से वंचित रहता है, देश के किसी भी कौने में एक भी किसान आत्महत्या करने पर मजबूर होता है तो पत्रकार का दावित्य होता है की सत्ता से सवाल करे, उसे जब मौका मिले सत्तापक्ष को सामने पाने का अपने कैमरा उनकी तरफ घुमाए और सवाल करे की ऐसा उनके साशन काल में कैसे हो गया?
पर यदि वो सवाल करने के बजाय गुणगान करने लग जाए तो समझो पत्रकारिता अपनी साख खो रही होती है और पत्रकार खुद तो अपाहिज होता ही है साथ ही साथ आने वाली पीढ़ियों को भी अपाहिज कर जाता है।

पर इस दौर में भी कुछ पत्रकार ऐसे बचे हुए है जिनके दम पर ये पत्रकारिता  ज़िंदा है और आप और मुझ जैसे लाखो लोगो का पत्रकारिता पर भरोसा कायम रखे हुए है।
धन्यवाद उन सभी पत्रकारों का जो सत्ता की इस भेड़चाल के साथ ना होकर हजारो गालियाँ झेलते हुए भी पत्रकारिता को ज़िंदा रखे हुए है।

नाम लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि चाहे हम उन एंकर/संवाददाताओं के हितेषी हो या गाली देने वालो में से पता आखिर सभी को है की सच्चा पत्रकार/एंकर/संवाददाता कौन है और कौन सत्ता के आधीन होकर खुद को अपाहिज बनाये हुए है।

धन्यवाद
जय हिन्द