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शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

Is Demonetisation really a Secret mission of Narendra Modi?

Is Demonetisation really a Secret mission या भाजपा नेता अपना काला धन पहले से ही सेट कर चुके?
जिस तरीके से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद वो लंबा चौड़ा भाषण देकर 500 और 1000 के नोट को बंद करने की घोषणा की ये कहते हुए की यदि मैं इसकी घोषणा कर रहा हूँ तो आप समझ सकते हो किसी को इसका पता नहीं था शक तो यही से शुरू हो जाता है की आखिर प्रधानमंत्री को क्या जरुरत आ गयी अपने कीमती समय में समय निकालकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस (राष्ट्र के नाम सन्देश) करने की। वो उन्होंने इसीलिए किया ताकि लोगो को भरोसा हो सके की सच में इस मिशन के बारे में किसी को पता नहीं था।


लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ भी नहीं था, भाजपा नेता और तमाम पूंजीपति पहले से ही अपने काले धन को ठिकाने लगा चुके थे क्योंकि उन्हें पहले से सब बता दिया गया था। तभी तो पंजाब के भाजपा नेता और भाजपा के लीगल सेल के कन्वीनर संजीव कम्बोज के पास 5 नवम्बर को ही 2000 के नोट पहुँच चुके थे, उन्होंने अति उत्साह में उस समय ये ट्वीट भी कर दिया था जो की आज उन्ही के नेता नरेंद्र मोदी की पोल खोल रहा है।
हो सकता है अब ये ट्वीट वायरल हो गया है तो वो डिलीट कर दे, तो मैंने इसका स्क्रीनशॉट भी ले लिया है। ध्यान से देखिये इस ट्वीट को इसके वो टैग करते है ज़ी न्यूज को मानो कह रहे हो देख भाई मैंने तो लगा दिए ठिकाने आपने लगाए या नहीं अभी तक?


जागो देशवासियों ये भाजपा सरकार देश के आम आदमी, गरीब, किसान, मजदूर, छोटे व्यापारी की दुश्मन है तभी तो बड़े कारोबारियों को राहत देकर आम आदमी को आज सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

अपाहिज होते पत्रकार

एक समय था जब पत्रकार और पत्रकारिता अपने दम पर बड़े बड़े सिंहासन हिला देती थी, जब एक पत्रकार अपना कैमरा नेताओं की तरफ घुमाकर सवाल के लिए मुहँ खोलता था तो उससे पहले नेताजी मुँह फिराकर भागने की सोचने लग जाते, की कही ये कोई सवाल कर लगा तो क्या जवाब देंगे।

तब नेता कैमरे का सामना करने की हिम्मत तभी करते थे जब उन्होंने सच में बहुत अच्छा काम कर दिया होता था। जब इतनी ताकत थी मीडिया के उस कैमरे और पत्रकार की कलम में तो आज फिर क्यों पत्रकार की कलम और मिडिया का कैमरा अपने आप में लाचार बेबस सा नजर आने लगता है?

सभी पत्रकार और संवाददाता तब भी किसी ना किसी दल के समर्थक होते थे पर उस समय उनमे भक्ति नहीं होती थी, उन्हें अपने राजनैतिक झुकाव से कहीं ज्यादा अपने दावित्य अपनी जिम्मेदारियों का ख्याल रहता था, हाँ कोई कोई तब भी अपवाद निकल जाता था पर आजकल तो पत्रकारिता को सही मायने में ज़िंदा रखने वाले एक अपवाद के तरह मिलते है।

जब से टीवी स्टूडियों के एंकर सवाल करते करते अचानक से खुद को प्रवक्ता समझ जिस दल के प्रति उनका रुझान होता है उसकी तरफ से सवाल करना शुरू करते करते धीरे धीरे अपने एंकर वाले पद से प्रवक्ता पद पर आकर उसी दल की तरफ से राज्य सभा में मंत्री या लोकसभा की टिकट हासिल करने लगे तब से कमोबेश हर तरफ टीवी स्टूडियों में बैठे एंकर अंदर ही अंदर ये चाहत रखने लग गए की वो गया है तो हम भी जा सकते है और इसी चाहत को बल देने  के लिए अपने दावित्व को भूल उस दल विशेष के प्रति काम करना शुरू कर देते है और यही से शुरुआत होती है अपने शक्तियों को कम करने की, उस शक्तिशाली कैमरे को कमजोर करने की।
और ये फिर यहाँ तक ही सिमित नहीं रहता फिर वो अपनी चापलूसी और उस दल विशेष के प्रति अपनी आगाध शृद्धा को और मजबूत बनाने के लिए अपने ही पेशे में किसी अन्य एंकर के सवाल पर भी सवाल खड़े करने लग जाता है, उस दल विशेष से किये गए किसी भी एंकर के सवाल को तोड़ मरोड़ कर अपने टीवी स्टूडियों में पेश कर दूसरे एंकर की फजीहत करना ये लोग अपना परम कर्तव्य समझने लगते है और ऐसा करते करते हो वो एकदम से भूल जाते है की वो नेता नहीं एक जिम्मेदार पत्रकार/सवांददाता/एंकर है।

जब आप भूल जाते है की आप क्या है तो स्वतः ही आपकी सभी शक्तियाँ भी समाप्त हो जाती है जैसे पवन पुत्र हनुमान अपनी भूल गए थे की वो कौन है तो वो अपनी शक्तियाँ भी भूल गए थे फिर सभी वानरों ने उनकी स्तुति कर उन्हें उनकी शक्तियाँ याद दिलाई तो वही हनुमान जी जो समुद्र को देखकर ही डर रहे थे एक छलांग में की योजन लांघ गए थे।

कई बार तो मन में प्रश्न आता है की जब एक पुलिसकर्मी अपनी जिम्मेदारी का सही तरीके से पालन नहीं करता तो उसे नौकरी से हटा दिया जाता है, किसी शिक्षक का परीक्षा परिणाम थोड़ा कम रहने पर उसे हजार सवालों का जवाब देना होता है, यहां तक की सीमा पर अपनी जान की परवाह किये बगैर हमारी सुरक्षा करने वाले सैनिकों से भी थोड़ी सी गलती पर उन्हें बड़ी से बड़ी सजा दे दी जाती है तो फिर ये पत्रकार/संवाददाता/एंकर जब अपना काम सही तरीके से नहीं करते है तो फिर इन्हे कोई सजा क्यों नहीं देता? क्यों इन्हे इनके पद पर बने रहने  दिया जाता है?

पत्रकारिता का विद्यार्थी तो नहीं रहा कभी पर इतना तो जानता हूँ की

"एक पत्रकार का कर्तव्य सत्ता से सवाल करना होता है सत्ता के गुणगान करना नहीं" 


जब तक इस देश का एक भी नागरिक भूखा सोता है, एक भी बच्चा शिक्षा से वंचित रहता है, देश के किसी भी कौने में एक भी किसान आत्महत्या करने पर मजबूर होता है तो पत्रकार का दावित्य होता है की सत्ता से सवाल करे, उसे जब मौका मिले सत्तापक्ष को सामने पाने का अपने कैमरा उनकी तरफ घुमाए और सवाल करे की ऐसा उनके साशन काल में कैसे हो गया?
पर यदि वो सवाल करने के बजाय गुणगान करने लग जाए तो समझो पत्रकारिता अपनी साख खो रही होती है और पत्रकार खुद तो अपाहिज होता ही है साथ ही साथ आने वाली पीढ़ियों को भी अपाहिज कर जाता है।

पर इस दौर में भी कुछ पत्रकार ऐसे बचे हुए है जिनके दम पर ये पत्रकारिता  ज़िंदा है और आप और मुझ जैसे लाखो लोगो का पत्रकारिता पर भरोसा कायम रखे हुए है।
धन्यवाद उन सभी पत्रकारों का जो सत्ता की इस भेड़चाल के साथ ना होकर हजारो गालियाँ झेलते हुए भी पत्रकारिता को ज़िंदा रखे हुए है।

नाम लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि चाहे हम उन एंकर/संवाददाताओं के हितेषी हो या गाली देने वालो में से पता आखिर सभी को है की सच्चा पत्रकार/एंकर/संवाददाता कौन है और कौन सत्ता के आधीन होकर खुद को अपाहिज बनाये हुए है।

धन्यवाद
जय हिन्द