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शनिवार, 17 दिसंबर 2016

कोशिश तो करे, उड़ान भरकर तो देखे

एक भाई का बहन के लिए प्यार और भावनाये जो शब्दों के सहारे बाहर निकल आई 
 
 "भाई" ये नाम जब तुम्हारे जहन में आता होगा 
तपती दुपहरी में जैसे मिल गयी हो छाँव 
ये अहसास दिलाता होगा। 

पुरुष की नजरो से निकलती वो धूप झुलसाने वाली 

तुझे उनसे बचा पाऊँ यही कोशिश में करता हूँ 
उन नजरो की आग जो पहुँचने वाली है तुम तक 
रोक तो लेता हूँ उन्हें पर मैं खुद भी डरता हूँ 

कब तक संग रहूँगा तेरे, 
बचा पाऊंगा में कितनी बार 
क्यों तेरा औरत होना ही 
बन जाती है तेरी सबसे बड़ी हार 

हिम्मत आये खुद तुझमे 
जो उस सुलसती आग से टकरा जाओ 
जो चाहती है झुलसाना तुझे 
उन्हें बनकर शोला जला आओ 

नारी हो ये सुनकर तुम 
कब तक अपने कदम रोकती रहोगी 
इस पुरुष प्रधान समाज के बंधन 
हर बार क्यों तुम ही सहोगी 

हूँ साथ तुम्हारे एक दोस्त की तरह, 
आओ मिलकर कदम बढ़ाते है 
है कुछ तो वजूद तुम्हारा भी 
इस दुनिया को अब दिखलाते है 

वो सपने वो कभी तुमने भी पाले होंगे 
आओ मिलकर उन सपनो को पंख लगाते है 
कोशिश तो करे, उड़ान भरकर तो देखे 
आखिर कहाँ तक पहुँच पाते है॥ 

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

ऐसी होती है माँ - Copied

एक माँ चटाई पर लेटी आराम से सो रही थी......
मीठे सपनों से अपने मन को भिगो रही थी.......

तभी उसका बच्चा यूँ ही घूमते हुये समीप आया....
माँ के तन को छूकर हल्के हल्के से हिलाया.....

माँ अलसाई सी चटाई से बस थोड़ा उठी ही थी....
तभी उस नन्हें ने हलवा खाने की जिद कर दी....

माँ ने उसे पुचकारा और अपनी गोदी में ले लिया.....
फिर पास ही रखे ईटों के चूल्हे का रुख किया....

फिर उसने चूल्हे पर एक छोटी सी कढाई रख दी...
और आग जलाकर कुछ देर मुन्ने को ताकती रही....

फिर बोली बेटा जब तक उबल रहा है ये पानी....
क्या सुनोगे तब तक कोई परियों बाली कहानी...

मुन्ने की आंखें अचानक खुशी से थी खिल गयी....
जैसे उसको कोई मुँह मांगी मुराद ही मिल गयी...

माँ उबलते हुये पानी में कल्छी ही चलती रही....
परियों का कोई किस्सा मुन्ने को सुनाती रही....

फिर वो बच्चा उन परियों में ही जैसे खो गया....
चटाई पर बैठे बैठे ही लेटा और फिर वहीं सो गया.....

माँ ने उसे गोद में ले लिया और धीरे से मुस्कायी.....
फिर न जाने क्यूँ उसकी आंख भर आयी.....

जैसा दिख रहा था वहां पर, सब वैसा नहीं था.....
घर में रोटी की खातिर एक पैसा भी नहीं था....

राशन के डिब्बों में तो बस सन्नाटा पसरा था....
कुछ बनाने के लिए घर में कहाँ कुछ धरा था....

न जाने कब से घर में चूल्हा ही नहीं जला था.....
चूल्हा भी तो माँ के आंसुओं से ही बुझा था......

फिर मुन्ने को वो बेचारी हलवा कहां से खिलाती....
अपने जिगर के टुकड़े को रोता भी कैसे देख पाती.....

अपनी मजबूरी उस नन्हें मन को मां कैसे समझाती....
या फिर फालतू में ही मुन्नें पर क्यों झुंझलाती.....

हलवे की बात वो कहानी में टालती रही.....
जब तक वो सोया नहीं बस पानी उबालती रही.....

ऐसी होती है माँ

नोट: ये रचना मेरी नहीं है, पर मुझे बहुत ही अच्छी लगी तो आप सभी के साथ शेयर करने के लिए यहाँ कॉपी-पेस्ट कर दिया।