एक बार जीवन का रथ, बढ़ा शुक्र के पथ पर,
और राजनीति ने डोरे डाले फिर सेवा के व्रत पर !
लक्ष्मण रेखा बड़ी क्षीण है, बड़ी क्रूर है काई,
कदम कदम पर फिसलायेगी रेशम सी चिकनाई !!
काजल के पर्वत पर चढ़ना, और चढ़ कर पार उतरना,
बहुत कठिन है निष्कलंक रह करके ये सब करना !!!
पर जब जब आप सहारा देते, इनका सर सहलाते,
जब जब इनको अपना कहकर अपने गले लगाते,
तब तब मुझको लगता है, ये जीवन जी लेंगे,
नीलकंठ कि तरह यहाँ का सारा विष पी लेंगे !!!!"
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| काजल के पर्वत पर चढ़ना, और चढ़ कर पार उतरना |

I love this👌👌👍👍
जवाब देंहटाएं:-) thank you Rachna ji
हटाएंबालकवि वैरागी जी की अद्भुत कविता।।
जवाब देंहटाएंjai ho
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 23 मई 2020 को लिंक की जाएगी ....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
वाह सुंदर
जवाब देंहटाएंHar angle se perfect ...
जवाब देंहटाएंperfect :-)
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