बुधवार, 8 जुलाई 2015

काश मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल होता

व्यापम में एक के बाद एक व्यापक स्तर पर हो रही मौत और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की चुप्पी बहुत से सवाल खड़े करती है|

क्या मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल होता तो प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी इसी तरह चुप्पी साधे रखते? सारी दुनिया जानती है की वो बिलकुल इस तरह चुप्पी साध कर नहीं बैठते बल्कि अपने सारे तंत्र का उपयोग कर अब तक तो केजरीवाल को जेल में डाल चुके होते और वहाँ पर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया होता|

यानि जो कुछ मध्यप्रदेश में हो रहा है उसमे बिना कोई फेरबदल किये केवल वहाँ का मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल होता तो प्रधानमंत्रीजी तुरंत एक्शन लेते और अब तक इस सभी हत्याओं के आरोपी के तौर पर अरविन्द केजरीवाल को जेल करवा चुके होते|

क्या सिद्ध करना चाहते है हमारे प्रधानमंत्रीजी? आखिर वो क्यों भूल जाते है की अब वो देश के प्रधानमंत्री पहले है और किसी पार्टी के सदस्य बाद में है!!

पुरे देश में किसान आत्महत्या कर रहे थे और अभी भी कर रहे है लेकिन प्रधानमंत्रीजी कभी भी इस पर नहीं बोले, दिल्ली में एक किसान ने आत्महत्या की और तुरंत मोदीजी का ट्वीट आता है, भाजपा के सभी प्रवक्ता सुबह से लेकर शाम तक टीवी स्टूडियो में बैठकर खुद ही जज बनकर अरविन्द और आम आदमी पार्टी को सजा सुनाने में लगे हुए थे|

जिस प्रदेश से वो किसान आता है उसी प्रदेश राजस्थान में ठीक उसी दिन एक और किसान ने आत्महत्या की और उसके अगले कुछ दिनों में ४ किसानो ने पर किसी भी मौत पर प्रधानमन्त्री को दर्द नहीं हुआ क्योंकि वहाँ पर उस पार्टी की सरकार है जिस पार्टी से वे खुद ताल्लुक रखते है भारतीय जनता पार्टी|

तो प्रधानमंत्री की के लिए अब दो तरह के मापदंड है एक वो राज्य जहां पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और एक वो राज्य जहां पर बीजेपी की सरकार नहीं है| जिन गैर भाजपा शासित राज्यों में कुछ भी होगा तो प्रधानमंत्रीजी तुरंत उस पर बोलेंगे भी और कार्यवाही भी तुरंत करेंगे, और भाजपा शासित राज्यों में यदि कुछ भी गलत होगा तो
प्रधानमंत्रीजी मनमोहन सिंह अवतार धारण कर चुप्पी साध लेंगे और उनके तमाम प्रवक्ता स्टूडियों में आकर उन्हें क्लीन चिट देने में लगे रहेंगे और इसके पीछे उनके तर्क वही रहेंगे कानून अपना काम कर रहा है, इस मामले पर जांच चल रही है, आदि आदि

तो क्या अब हमे हर प्रदेश में आम आदमी पार्टी की सरकार चुननी पड़ेगी ताकि प्रधानमंत्रीजी उस पर अपनी पैनी नजर गडाए बैठे रहे और कुछ भी गलत हो तो तुरंत उस पर कार्यवाही कर सके?

फिर तो सच में भारत वासियों को चाहिए की हर प्रदेश में आम आदमी पार्टी की सरकार बनाए चाहे वो इस पार्टी से प्यार करते हो या नहीं करते हो, पर अपने प्रदेश के भले के लिए झाड़ू वालो की सरकार बनाए, क्योंकि ऐसा करने पर वो पूर्ण रूप से आश्वस्त हो सकते है की पहली बात तो आम आदमी पार्टी कभी को गलत काम करेगी नहीं और अगर संयोंग से उनसे कुछ गलती हो जायेगी तो मोदीजी तुरंत अपने पुरे तंत्र का प्रयोग करके उनको सजा दिला देंगे| जैसे अभी फर्जी डिग्री केस में आम आदमी पार्टी के विधायक और दिल्ली के भूतपूर्व कानून मंत्री जीतेन्द्र तोमर के केस में हुआ|

आम आदमी पार्टी से गलती हो गयी की उन्होंने तोमर की बातो पर भरोसा कर लिया लेकिन केंद्र और भाजपा ने उस पर कानून से ऊपर उठकर भी कार्यवाही करते हुए उन्हें बिना किसी पूर्व नोटिस के एक आतंकवादी की तरह भारी पुलिस दल के साथ उनके ऑफिस से उठवा लिया गया, जब उन्हें कोर्ट में पेश किया तो खुद कोर्ट ने इस कार्यवाही पर सवाल खड़े किये की आखिर ऐसा क्यों किया गया? जब पहले से ही इस मामले की सुनवाई कोर्ट में चल रही है, अगली सुनवाई की तारीख भी तय कर चुके है तो फिर क्यों उन्होंने ऐसा किया, क्या कोर्ट की कार्यवाही पर उनका भरोषा नहीं है?

खैर मैं यहाँ पर जीतेन्द्र तोमर की वकालत नहीं कर रहा हूँ, और नाही पार्टी की तरफ से उन्हें बचाने की कोई कोशिश की गयी, पार्टी का साफ़ मानना है की अगर जीतेन्द्र तोमर सही है तो वो सभी कानूनी प्रकिया से गुजरे और अपने आप को सही साबित करदे और अगर वो गलत है तो उन्हें सजा जरुर मिलनी चाहिए|
लेकिन इस मामले में इतनी जल्दी सभी कार्यवाही केवल इसीलिए हो पायी क्युकी ये मामला आम आदमी पार्टी से जुड़ा हुआ है वरना तो आप देख रहे है कितनी ही मंत्री और विधायको की फर्जी डिग्री के मामले में रोज खबर आती है पर कार्यवाही आजतक किसी पर भी नहीं हुयी|

तो इन सब से सिद्ध तो यही होता है की अगर हम चाहते है की किसी प्रदेश में कुछ भी गलत नहीं हो तो वहाँ पर अगले चुनाव में आम आदमी पार्टी को पूर्ण बहुमत दिलाये और सरकार बनाए फिर देखें वहाँ पर एक साफ़ सुथरी सरकार चलेगी, वो स्वतः ही साफ़ सुथरी सरकार होगी और गलती से कही कोई गन्दगी आ भी जायेगी तो
केंद्र में बैठ सरकार उसे एक पल भी बर्दाश्त नहीं करेगी|

जय हिन्द वन्दे मातराम

सोमवार, 22 जून 2015

Holi In Italy इटली में हिन्दू भारतीय त्यौहार होली

This is the translation of original post of Italian news paper Mattino Di Padova
Link of original news
http://mattinopadova.gelocal.it/padova/cronaca/2015/06/21/news/holi-un-arcobaleno-umano-animato-dalla-musica-1.11653803

होली, संगीत के साथ एनिमेटेड मानवीय इन्द्रधनुष 
साल के सबसे रंगीन त्यौहार के युगानेओ में तीसरे संस्करण को अपार सफलता: 6 घंटे तक untoxic रंगो के पाउडर से लड़ाई (एक दूसरे पर रंग फेंककर)
पादोवा।  शेयरवुड फेस्टिवल में रंगो के वार्षिक त्यौहार होली उम्मीदों पर आयोजन किया गया: सबसे रंगीन तीसरे संस्करण को अपार सफलता मिली, 18000 (अठारह हजार) युवाओं ने नेरेओ रोक्को वियाले के उत्तर भाग में युगानेओ स्टेडियम में भाग लिया।
होली प्राचीनत्तम हिन्दू त्यौहार हो यक्ष होलिका को समर्पित है से लिया गया है, इस एक दिन के लिए लोग जात पात और उंच नीच को भूल जाते है। इस त्यौहार के दिन लोग एक दूसरे से रंगो के पाउडर के पैकेट लेकर एक दूसरे से भिड़ते है और मानवीय इन्द्रधनुष की शृंखला बन जाती है। 
आधी रात तक डीजे टीम के म्यूजिक के साथ रंगो का युद्द( एक दूसरे पर रंग फेंकना) पहले मुख्य मंच के सामने खेला गया और बाद में दूसरे मंच के सामने आयोजन किया गया। untoxic रंग प्रवेश द्वार पर खरीद के लिए उपलब्ध थे। 
(सुरक्षा पैमाने को मध्य नजर रखते हुए आयोजको को यहां के प्रशासन को सुनिश्चित करना होता है की कोई भी रंग किसी को नुक्सान ना पहुंचाए और रंग toxic ना हो, तो इसके लिए आयोजक प्रवेश द्वार पर खुद रंग बेचते है और केवल आप वही रंग इस्तेमाल कर सकते है, रिजर्वेशन के समय ही हिदायत दे दी जाती है की कोई भी घर से रंग लेकर नहीं आ सकता।)
विडियो(जब रंग एक दूसरे पर फेंकने का काउंटडाउन हुआ) अन्य फोटो के लिए ऊपर दिए गए इटालियन अखबार के लिंक पर देखे।
 

इस त्यौहार का आयोजन इटालियन लोग ही करते है और भाग लेने वाले भी इटालियन ही होते है, खैर सभी भाग ले सकते है किसी को मना नहीं है, लेकिन यहां हो भारतीय है वो केवल अपनी मेहनत मजदूरी में लगे रहते है तो इन आयोजनो में इतना भाग नहीं लेते है, ये मैंने इसलिए लिखा क्योंकि आजकल भारत में क्रेडिट चोरी में कुछ लोग मशहूर हो रहे है तो क्या पता कल को किसी को पता लगे की इटली में होली का त्यौहार मनाया जाता है तो क्रेडिट चोर जल्द से मीडिया में आकर बोलने लग जाए देखिये हमने कैसे होली को इतना फेमस बना दिया की विदेश में लोग होली मनाते है। 
 


गुरुवार, 5 मार्च 2015

क्या सच में अरविन्द तानाशाह है?

शायद पार्टी बनने के बाद से लेकर आज तक ऐसा पहली बार हुआ है की अपने आप को "आम आदमी पार्टी" के समर्थक या वॉलंटियर कहने वाले लोग सोशल मिडिया पर अरविन्द की बुरी तरह आलोचना कर रहे है है। 
कारण?
हम्म्म …… 
सच पूछो तो असली कारण किसी को नहीं पता पर हाँ आलोचना और गालियों की कमी नहीं है, इल्जाम लगने शुरू हो गए है और जो कुछ लोग अब भी पार्टी के समर्थन में खड़े है उन्हें अंध भक्त की संज्ञा देना शुरू हो चुका है। 
कितना अच्छा चल रहा था सब कुछ पार्टी ने भारत के इतिहास में एक नया इतिहास रच दिया इतनी जबरदस्त सफलता के साथ और साथ ही साथ इस सफलता के अरविन्द का कद और भी बड़ा हो गया। 
खैर पहले ही बतादूं मेरे पास कोई पद नहीं "आम आदमी पार्टी" में और शायद जिन्हे हम सब बड़े नेता मानते है "आप" के उन्हें तो ये भी नहीं पता होगा की राम किरोड़ीवाल नाम का एक समर्थक है उनका। ये मैंने इसलिए लिखा तांकि ये साफ़ हो जाए की मैं किसी की वकालत करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, हाँ मेरे मन में विचार थे सो मैंने लिखना जरुरी समझा। 
जब तक लोग ये आवाज उठाते है की हमे पूरी जानकारी दी की ऐसा क्यों हुआ? तब तक तो ठीक है पर जब आप अरविन्द को भला बुरा कहना शुरू कर देते है, उन पर तानाशाह का आरोप लगाते है और भी आगे आप अभद्र भाषा का प्रयोग करते है तब अफ़सोस होता है की क्या हम वाकई में इतने कमजोर है की अपने आप को कुछ दिन के लिए रोक नहीं सके? कुछ दिन हम इन्तजार नहीं कर सकते इस पुरे घटनाक्रम पर पार्टी की तरफ से कोई स्पष्टीकरण आने तक?
अब लोग कह रहे है तानाशाह तो है ही अरविन्द उसने खिलाफ बोलने पर योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर का रास्ता दिखा दिया? मैं आपके इस तर्क से असहमत हूँ। 
यदि अरविन्द तानाशाह होता तो ये चार-पांच दिन से मसला चल रहा था, वो तुरंत अपना तानाशाही फरमान जारी करते और योगेन्द्रजी व प्रशांत जी को पार्टी से निष्काषित कर देते। पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया, पार्टी के राष्ट्रिय कार्यकारिणी की मीटिंग हुयी और उसमे खुद अरविन्द नहीं आये ताकि यदि किसी को उनके खिलाफ बोलना है आसानी से बोले, पता नहीं सामने सभी अच्छा बोले मजबूरी में क्योंकि तानाशाह जो ठहरे अरविन्द तो उनकी अनुपस्तिथि में आराम से आप बोल सकते है। 
कुल आठ घंटे "आप" की राष्ट्रिय कार्यकारिणी की बैठक चली तो इन आठ घंटो में जाहिर है हर तरह के मुद्दे उठे है, सवाल जवाब हुए है, आरोप प्रत्यारोप हुए है, सभी ने अपना पक्ष रखा है। योगेन्द्रजी और प्रशांत जी ने भी अपना पक्ष रखा है और हाँ इन विचारो की जंग में वो अकेले नहीं थे उनके भी समर्थन में आखिर में आठ वोट आये है और विपक्ष में 11 वोट गए तो कुल मिलाकर इस आठ घंटे की मीटिंग में एक तरह से माने दो टीम थी, एक तरफ आठ लोग थे दूसरी तरफ 11 लोग थे तो कमजोर तो दुसरा दल भी नहीं था। उन्होंने अपनी बात राखी है बस हाँ, वो 2 और लोगो को अपने विचारो से जोड़ने में नाकामयाब रहे और इसके फलस्वरूप उन्हें "आप" की "PAC" से बाहर जाना पड़ा। ना वो पार्टी से बाहर हुए है, ना उनकी सदस्यता खत्म हुयी है हाँ एक कमेटी के सदस्य नहीं है, तो यदि कुछ लोग जो इसे गलत मानते है की इन्हे बाहर क्यों निकाला वो क्या इस पार्टी में इसीलिए जुड़े है की कुछ लोगो को एक पद और प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए?
जब साफ़ कहा जाता है की यदि पद और टिकेट के लिए पार्टी से जुड़ना चाहते है तो प्लीज इस पार्टी में मत आइये और बहुत से दल है किसी में भी चले जाइए, अगर यहां आना है तो सेवा के लिए आये। 
तो जब हमे सेवा ही करनी है तो उसके लिए कोई पद है या नही उससे कौनसा फर्क पड़ता है?
अब लोग कहने लग गए की "आप" भी अन्य दलों के जैसे हो गयी जो खिलाफ बोलता है उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है भाई यदि सच में ऐसा होता तो मैं फिर दोहरा रहा हूँ ये मीटिंग करने की जरुरत ही नहीं थी यो ही एक आदेश निकल देते की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने हस्ताक्षर करके एक पत्र  दिया है की इन्हे PAC से हटाया जाए और हमने हटा दिया है, भाई मेरे आठ घंटे तक सभी 20-25  लोग एक बंद कमरे में बात क्यों करते? 
अब आप कह सकते है की अपनी छवि खराब ना हो इसके लिए ये सब नाटक किया गया, तो क्या अब छवि खराब नहीं हुयी? क्या अब लोग सवाल नहीं उठा रहे? क्या अब लोग भला बुरा नहीं कह रहे? थोड़ा तो अपना दिमाग लगाओ भाई!! या फिर जब तक पार्टी की तरफ से इस सारे प्रकरण पर कोई स्पष्टीकरण नहीं आता तब तक हम शांत रहे या ये मांग करते रहे की हम इस पर जल्द स्पष्टीकरण दे। 
योगेन्द्रजी और प्रशांत जी आज भी पार्टी में वरिष्ठ सदस्य है, किसी पद मिलने और न मिलने से क्या उनके वरिष्ठता या उनके अनुभवों पर कुछ असर पड़ता है क्या? और हाँ यदि आज बाहर है PAC से तो क्या कल वापस अंदर नहीं आ सकते? जिन आठ लोगो ने उनका समर्थन किया था की उनेह PAC से नहीं हटाया जाना चाहिए वो तो अभी भी अंदर ही है ना!!! उन्हें तो उठाकर बाहर नहीं किया? वो कल को इस की दुबारा मांग कर सकते है। 
अब ये मत कहना की भाई जो अरविन्द चाहते है वही होता है। 
अरविन्द तो कभी नहीं चाहता था की "आम आदमी पार्टी" लोकसभा चुनाव में पूरे देश में चुनाव लड़े, पर इसी राष्ट्रिय कार्यकारिणी में उस समय बहुमत उन लोगो के साथ चला गया जो चाहते थे "आप" पूरे देश में चुनाव लड़े। अरविन्द तानाशाह ही होता तो तब अपना तानाशाही फरमान जारी कर सकता था की नही मैंने कह दिया चुनाव नहीं लड़ेंगे तो नहीं लड़ेंगे! पर उन्होंने स्वीकार किया बहुमत सो जो निर्णय लिया उसको और स्वीकार ही नहीं किया अपनी जी जान भी लगाई इस लड़ाई को लड़ने के लिए खैर वो अलग बात है की फिर उसमे सफलता नहीं मिली। 
लिखने को बहुत कुछ है जब शुरू कर दिया तो अंत होने का नाम ही नहीं ले रहा, पर शायद इतना ज्यादा पढ़ते पढ़ते आप भी बोर हो जाएंगे तो बेहतर होगा यही कहते हुए मैं अपनी बात को विराम दूँ, संकट की घड़ी है सब साथ दे, आपके विचार है राय है तो उन्हें लोगो को सामने रखे, आरोप प्रत्यारोप से बचे, और हाँ कम से कम अरविन्द को तानशाह, लालची, सत्ता का घमंड ये उपमाए तो ना दे भगवान के लिए। 

और हाँ एक आखिर हिंट दे देता हूँ इस सारे घटनाक्रम को आप इस नजरिये से देख सकते है "अरविन्द को क्यों जरुरत पड़ी रामलीला मैदान से अपनी बात कहने की" कि जब से हमे ये अपार सफलता मिली है हमारे कुछ साथी उत्साह में घोषणा करने लग गए है अब हम यहां से चुनाव लड़ेंगे अब हम वहां से चुनाव लड़ेंगे, हम अभी कहीं से चुनाव नहीं लड़ेंगे हमारा पूरा ध्यान दिल्ली पर केंद्रित रहेगा, यहाँ के लोगो ने जो उम्मीद हमसे लगाई है हम उसे पूरा करने में अपनी जी जान लगाएंगे। 
मुझे तो कुछ तभी लगने लग गया था की पार्टी में सब कुछ ठीक तो नहीं है वरना एक राष्ट्रीय कन्वेनर को क्या जरुरत पड़ी ये बात भी रामलीला मैदान से घोषणा करने की। 


Teg: Arvind kejriwal, aam aadmi party, yogendra yaadav, prashaant bhushan, AAP, YO YO, Yo ya, Yo ya and PB, Yo&PB, NE, PAC,

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

हम है देशी .. हम है देशी हाँ मगर हर देश में छाये है हम

Dr. Kumar Vishwas in live Concert
इस धरा से भी वफादारी का प्रण हमने चुना है।
पूरी दुनिया अपना घर है ये ही बचपन से सुना है॥
हम कि जो सरहद से दुरी पर हैं लेकिन लाम पर हैं।


हम की जो होली दिवाली ईद पर भी काम पर है॥
हमने पतझर भर लिया है खुद ही अपने सावनो में।
तब कही चुन चुन किरण भेजी है घर के आँगनों में॥
रौशनी के इस बड़े मेले में हम खोये नहीं है।
आंसुओ का एक समुन्दर हैं मगर रोए नहीं हैं॥
पापियो का कल मिटाकर खुद ही खुद को आज देगा।
हम इसी आशा में जीते हैं वतन आवाज देगा॥
क्रांति की ज्वाला यहाँ भी खुद में सुलगाएँ हैं हम।
हम हैं देसी हम हैं देसी हम हैं देसी हाँ मगर हर देश में छाए हैं हम॥
नई लाइने


डॉ कुमार विश्वास 

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

विदेशी मिडिया में अरविन्द केजरीवाल और आप

इटली के सबसे विश्वनीय समाचार एजेंसी ने आम आदमी पार्टी की अभूतपूर्व सफलता को 2  न्यूज़ में कवर किया एक में जीत के विवरण को और दूसरी में अरविन्द केजरीवाल के सम्बोधन को। 
 
यहाँ दोनों का हिंदी अनुवाद लिख रहा हूँ। 


(ANSA) - नयी दिल्ली, 10 फरवरी - दिल्ली "ह्रदय" (यहाँ हृदय देश के ह्रदय के सन्दर्भ में लिखा है) के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पटेल नगर के मंच से आप के समर्थको से बोलते हुए जब उन पर फूलो की वर्षा हो रही थी, सभी लोगो का धन्यवाद किया जिन्होंने इस महान विजय में अपना सहयोग दिया। 
अपनी पत्नी और पिता को सबके सामने प्रेजेंट करने के बाद कहा "ये मेरी जीत नहीं है बल्कि कार्यकर्ताओं की जीत है" और अपार सफलता के बावजूद भी सभी से अनुरोध किया की कोई इस पर घमंड ना करे। 





 (ANSA) - नयी दिल्ली, 10 फरवरी - भ्रष्टाचार विरोधी एक्टिविस्ट अरविन्द केजरीवाल के दल आम आदमी की पार्टी ने नयी दिल्ली विधानसभा के शनिवार को हुए चुनाव में अपने सिद्धांतो पर खरा उतरते हुए सम्पूर्ण सफलता प्राप्त की, भारतीय चुनाव आयोग के अनुसार  70 में से 64 प्राप्त की (आर्टिकल सम्पूर्ण रिजल्ट आने से पहले ही प्रकाशित हो गया था)। विपक्षी दल प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के हिन्दू दल जो की इन चुनाव में किरण बेदी के नेतृत्व में लड़े गए शायद 5  सीट ही जीत पाएंगे। सोनिया गांधी के दाल कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

AAP Funding Scam-बीजेपी की एक घटिया चाल या सच में घोटाला?

आज 2 फरवरी को अचानक से मीडिया में चल रहा है आम आदमी पार्टी के फंडिंग स्कॅम के बारे में!
आज ही क्यों?
अरे भाई पता नहीं 7 फरवरी को चुनाव है और बीजेपी दिल्ली में हार रही है तो कुछ तो करना ही पडेगा ना, अब मुद्दो पर बीजेपी बैकफुट पर है, लोकसभा चुनाव में तो महँगाई, काला धन, गंगा माँ की सफाई  और नारी सुरक्षा को मुद्दा बनाकर वोट मांग लिए लेकिन अब तो बीजेपी इन सबका नाम भी नहीं ले सकती हाँ उलटे डरती है कि कहीं कोई इन मुद्दो पर उनसे पूछ ना ले तो क्यों ना नकली मुद्दे बनाये जाए ताकि असली मुद्दो से जनता को गुमराह किया जा सके। 

जो बीजेपी लोकसभा  में "बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार" का नारा देती थी वो आज महंगाई को रोक नहीं पा रही और ये तो तब है जब अंराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम आधे हो गए है अर्थात यदि भारत सरकार कुछ ना भी करे तो भी महंगाई स्वतः की कम हो जानी चाहिए थी पर नहीं हुयी। 
सो दिन के लिए मुझे दिल्ली की गद्दी दे दो विदेशो में पड़ा सारा काला धन वापस लाऊंगा और हरेक भारतीय के खाते में 15 लाख रूपये होंगे बिना कुछ किये सरकार को कुछ नहीं करना पडेगा। 
कुछ ऐसे ही बोलते थे अपनी सभाओ में मोदीजी पर आज सरकार बने 100 दिन नहीं 253 दिन हो गए है पर काला धन वापस लाना तो दूर अभी तक सरकार ने इसके लिए अपनी तरफ से कोई प्रयास भी नहीं किया एक SIT का गठन किया वो भी तब जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया। 
गंगा माँ की सफाई को मुद्दा बनाया उसे तो मानो भूल ही गए, सुप्रीम कोर्ट ने एक नहीं 3-4 बार मोदी सरकार को फटकार लगाई की कहाँ है आपका प्लान गंगा की सफाई का, तब जाकर तो सरकार ने अपना प्रोजेक्ट पेश किया की वो कैसे सफाई करेंगे गंगा माँ की और उस पर भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई की जो प्लान आप पेश कर रहे हो उससे तो गंगा 200 साल में भी साफ़ नहीं होगी। 
महिला सुरक्षा का नारा देने वाली बीजेपी ने महिलाओ के मुहं पर ऐसा तमाचा मारा की शायद ही कोई समझदार महिला बीजेपी को वोट देगी, बलात्कारी निहालचंद को बीजेपी ने मंत्री पद दे दिया। तो कहाँ है वो वादे जो जनता से किये थे? 
BJP and Congress receiving foreign funding

कोई ये सवाल ना पूछले इसलिए रोज नए मुद्दे पैदा किये जाते है तांकि आप और हम उन्ही पर बहस करते रहे और बीजेपी से जिन मुद्दो पर उन्होंने वोट मांगे थे उनपर सवाल ना करे। 


पिछली बार भी दिल्ली विधानसभा चुनाव के कुछ दिन पहले ही ऐसे ही आरोप बीजेपी ने "आम आदमी पार्टी" पर लगाए थे। चलो पिछली बार की तो मान लेता हूँ की बीजेपी के पास सत्ता नहीं थी उस समय तो केवल आरोप ही लगा सकती थी। लेकिन अब जब बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार है तो फिर ये आरोप? केवल जनता को गुमराह करने के लिए तो नहीं है? 
यदि सच में ऐसा है तो बीजेपी क्यों नहीं तुरंत "आप" की फंडिंग की जांच करके सभी को जेल में डालती है? आज ही तुरंत सारा प्रशाशन लगाए, सभी टीम भेजे शाम होने तक जांच करके और कल सुबह होने से पहले तो सभी अपराधियों को जेल में भेज सकते है लेकिन बीजेपी ऐसा नहीं करेगी क्योंकि उन्हें भी पता है यदि जांच करवाई तो फिर रिपोर्ट देनी पड़ेगी और रिपोर्ट में आम आदमी पार्टी की फंडिंग पर कोई सवाल नहीं खड़ा कर सकता है केवल यही तो एकमात्र पार्टी है जिसने फंडिंग को ट्रांसपेरेंट रखा है और इससे इन्हे नुक्सान भी हो रहा है कई लोग केवल "आप" को चन्दा इसलिए नहीं देते क्योंकि उन्हें डर  है की उनका नाम भी ये वेबसाइट पर डाल  देंगे। 
तो दोस्तों बीजेपी ने एक बार फिर अपनी गन्दी राजनीती करते हुए केवल अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को बदनाम करने की कोशिशि की है। देखना ये होगा दिल्ली की जनता कितनी समझदार है वो बीजेपी की इन चालो को समझ पाती है या नहीं। 
धन्यवाद॥ जय हिन्द॥   


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गुरुवार, 29 जनवरी 2015

Is Kiran Bedi a liar? तो क्या किरण बेदी झूठी है?

यही कहानी सुनते सुनते हम बड़े गए है "एक बहादुर पुलिस अधिकारी जिसने अपनी ड्यूटी निभाते हुए प्रधानमन्त्री की कार उठवा दी थी" और जब ये सुनते थे हम भी बहुत गर्व करते थे और दिल से यही निकलता था शाबास किरण बेदी तुम करोड़ो हिन्दुस्तानियों के  प्रेरणा हो। हमारे माँ बाप ने हमे यह कहानी सुनाई किरण बेदी की बहादुरी की मिसाल देते हुए और हम ये कहानी अपने बच्चो को सुनाते रहे उसी किरण बेदी की बहादुरी की मिसाल देते हुए पर ये क्या आज हमे पता लगा की ये सब झूठ था!!!
हमे पता लगा की किरण बेदी कैसे दुनिया से झूठ बोलती रही!!!
कैसे भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी बनने वाली किरण बेदी अपनी शान में झूठ बोलकर लोगो को गुमराह करती रही?
आज मेरे ही बच्चो के सामने मैं झूठा हो गया, आज मेरे बच्चे मुझसे ये  सवाल करते है पापा आपने हमे झूठी कहानी क्यों सुनाई?
खैर मैंने तो इसलिए सुनाई क्योंकि ये झूठ खुद किरण बेदी ने फैलाया था और मैंने उस पर भरोषा कर लिया मुझे क्या पता था की किरण बेदी भरोषे करने लायक नहीं है, जो औरत इतना बड़ा झूठ बोल सकती है किसी और का काम का श्रेय भी खुद लेती है उस पर कोई कैसे भरोषा करे।
अब जैसे की वो भारतीय जनता पार्टी की सदस्य है (अभी दिल्ली बीजेपी की तरफ से विधानसभा चुनाव भी लड़ रही है और दिल्ली बीजेपी के मुख्यमंत्री पद की दावेदार भी) तो जरूर भाजपा के कार्यकर्ता ये सवाल करेंगे की नहीं उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा ये तो लोगो ने अफवाह फैला दी, तो दोस्तों यहाँ मैं कुछ ऐसे सबूत रखना चाहता हूँ जहाँ खुद बेदी ने कहा की उन्होंने कार उठायी थी, और अफ़सोस उन्हें जरा भी शर्म नहीं आई छोटे छोटे बच्चो के सामने झूठ बोलते हुए।
ये टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के 27  अप्रेल 2010  के अखबार में छपी हुयी खबर है   
Times of India 27 April 2010
Cutting of News Paper Times of India
“I knew I will be transferred when I decided to tow Indira Gandhi’s car (for illegal parking). I gave a thought to it and decided to do what was right then,” Bedi said at a programme in Bhopal School of Social Sciences here She was replying to a student,who asked her about the daring incident to remove the car of the all-powerful Indira Gandhi. “I was transferred to Goa the next day, but that did not deter me from doing right things,” Bedi said.  B h o p a l : Going nostalgic, former IPS officer Kiran Bedi on Monday said she went on to remove former Prime Minister Indira Gandhi’s car for illegal parking despite being fully aware her action might earn her a transfer.


एक स्कूल के फंक्शन में खुद किरण बेदी ने ये बहुत बड़ा झूठ बच्चो के सामने कहा!
कुछ दिन पहले तक सोशल साईट ट्वीटर पर अपनी प्रोफाइल के बायो ने भी बड़ी शान से अपनी उपलब्धियों को गिनाती हुयी वो लिखती है 

Kiran Bedi (@thekiranbedi)
Former Cop, Magsaysay Awardee, UN Police Advisor, Asian Tennis Champion, Towed PM's car for Traffic violation, Voted Most Trusted Woman, Founded two NGOs, Author+

अब जब विवाद बढ़ा तो उन्होंने ये लाइन अपनी प्रोफाइल से डिलीट कर दी, लेकिन वेब की दुनिया भी निराली है बेदी की ट्वीटर प्रोफाइल की बैकअप फोटो इंटरनेट पर उपलब्ध है। 

इतना बड़ा झूठ बोलने वाली महिला को मोस्ट ट्रस्टेड वुमन भी चुना गया वाह क्या बात है !
धन्य है NDTV India के निर्भीक और ईमानदार पत्रकार रविश कुमार जिन्होंने इस गुत्थी को सुलझाया और सच हम सब तक पहुंचाया की वो कार किरण बेदी ने नहीं उठायी थी, इतना ही नहीं उन्होंने बहुत ही बहादुरी से इस पूरे घटनाक्रम और किरण बेदी के बड़े झूठ का पर्दाफ़ाश किया। 
वो कार बेदी ने नहीं बल्कि सब इंस्पेक्टर निर्मल सिंह ने उठायी थी और उस समय तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी भारत में भी नहीं थी और कार भी उनकी निजी ना होकर प्रधानमन्त्री कार्यालय की कार थी अब कार्यालय की कार मतलब किसी की भी हो सकती है, बाबू अफसर कर्मचारी। और वो कार वहाँ पर मिस्त्री के यहाँ ठीक करवाने के लिए आई थी। 
चलो देर ही सही कम से कम धन्यवाद रविश जी का की आज उनकी बदौलत एक बहुत बड़ा झूठ जो दशको से चला आ रहा था खत्म हुआ और लोगो को सच का पता लगा। 

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शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

किरण बेदी में नहीं है कोई प्रशासनिक क्षमता

मेरी नजर में किरण बेदी में कोई प्रशासनिक क्षमता नहीं है,  हाँ उसमे जो क्षमता मुझे दिखाई दी वो है मौका परस्ती और महत्वाकांक्षी होना और अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिये वो किसी भी हद तक गिर सकती है ये हाल ही मैं उनके राजनीति में आने के निर्णय से साफ़ झलकता है। 
जिस आन्दोलन की वजह से उन्हें दुनिया में पहचान मिली वो इन सभी भ्रष्ट राजनैतिक दलों के भ्रष्टाचार के खिलाफ था और आज वो खुद इन्हीं भ्रष्ट दलों में से एक दल भारतीय जनता पार्टी की सदस्य है। 
आखिर कौनसे ऐसे कारण थे जिनकी वजह से उन्होंने अपने जमीर को भी गिरवी रख दिया? शायद पैसा? या फिर उनके द्वारा किया गया ऐसा कोई भ्रष्टाचार जो की बीजेपी के हाथ लग गया और जैसे की अब बीजेपी की सरकार है सम्भवतः बीजेपी ने उन्हें ऑफर रख दिया होगा कि या तो उनकी पार्टी  में शामिल हो या फिर उन्हें उस कथित भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेजा जाएगा। 
कुछ तो जरूर हुआ है, वो केवल सेवा करने के लिए तो बीजेपी में नहीं आई है ये काम तो बखूबी वो पार्टी से बाहर रहकर भी कर सकती थी। जो भाजपा अपने सभी पुराने बड़े नेताओ को किनारे करकर किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद  सकती है क्या वो किरण बेदी कोई सुझाव बिना पार्टी में शामिल हुए देती तो बीजेपी उस पर गौर नहीं करती क्या? यदि नहीं करती तब तो सवाल बीजेपी पर भी खड़े होते है कि क्या इस देश के नागरिक से भी बड़ी उनके लिए पार्टी हो गयी?
जो कार्यकर्ता भाजपा में वर्षो से अपना खून पसीना बहा रहे थे उनपर एकदम  पानी फेर दिया और उन सब नेताओं और कार्यकर्ताओं को ताक पर रखते हुए किरण बेदी को लाकर सबके ऊपर बैठा दिया। 
और मजे की बात है की किसी ने इसका खुलकर विरोध भी नहीं किया क्योंकि सबको पता है उसके ऊपर मोदी और अमित शाह का हाथ है और इसका विरोध करना यानी खुद ही अपनी मौत को बुलावा देना। 
शुरुआत में मैंने बेदी के प्रशासनिक क्षमताओं पर सवाल खड़ा किया क्योंकि जो मैंने उन्हें जाना है वो शोशल मीडिया पर जाना है और सोशल  पर उनका व्यवहार उनकी अपरिपक्वता को दर्शाता है। यदि कोई बेदी से सवाल करले तो वो उन्हें ब्लॉक कर देती है जिससे आप उन्हें सवाल नहीं कर सकते, उनसे बात केवल वो ही कर सकते है जो उनकी प्रशंसा करते हो। 
तो क्या कल को वो अपने क्षेत्र में निकलेंगी और कोई उनसे कहेगा मैंने आपको वोट दिया मेरे घर पानी क्यों नहीं आता है तो वो उसे जेल में डाल देंगी क्योंकि यहाँ पर ब्लॉक करने वाला ऑप्शन तो है नहीं तो जरूर वो उन्हें जेल   डालेंगी,यानी जनता उन्हें कोई सवाल करेगी तो वो सब को जेल में ब्लॉक कर देंगी?
एक अच्छा प्रशानिक अधिकारी यह नहीं  करता,वो जनता  के सवाल सुनेगा और उनके सवाल का जवाब देने की कोशिश करेगा, उनकी समस्याओं  का निदान करेगा। 
सवालों से भागना आपकी कायरता को दर्शाता है नाकि आपकी क्षमताओं को। । 
वन्दे मातरम ॥ जय हिन्द ॥ 


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मंगलवार, 13 जनवरी 2015

Asaram witness murdered - क्या आसाराम को गवाहों के अभाव में निर्दोष साबित करने की तैयारी चल रही है?

जैसे ही भाजपा सरकार में आती है एक के बाद एक आसाराम के खिलाफ सरकारी गवाह बने व्यक्तियों की हत्या हो रही क्या ये गवाहों के अभाव में आसाराम को निर्दोष साबित करने की एक कोशिश है?

Asaram Akhil Gupta witness
Akhil Gupta Witness Surat Rape case
रविवार 11 जनवरी 2015 को आसाराम प्रकरण में अहम सरकारी गवाह अखिल गुप्ता की मुजफ्फरनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गई।

इससे पहले एक अन्य अहम सरकारी गवाह अमृत प्रजापति की गोली मारकर हत्या करदी गई
पढ़े मेरा लेख

आसाराम बलात्कार प्रकरण में अहम गवाह की हत्या  

अब दूसरे महत्वपूर्ण गवाह की हत्या, अभी तक अमृत प्रजापति के हत्यारों को सरकार और प्रशासन पकड़ ही नहीं पायी और अब दूसरे गवाह की भी हत्या करवा दी गयी है।

हमारी सरकार क्या सन्देश देना चाहती है जनता है? कि  सरकार किसी भी सरकारी गवाह की रक्षा करने में समर्थ नहीं है? यदि ऐसा ही होता रहा तो कौन सरकारी गवाह बनेगा, कौन अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करेगा?

हमारी वर्तनाम भाजपा सरकार क्या केवल यही सन्देश देना चाहती है की अब यहां पर केवल तानाशाही चलेगी।
हाँ मुझे पता है कि मैं मेरे इस लेख में सरकार पर अंगुली उठा रहा हूँ जबकि मुद्दा आसाराम है, मैं बीजेपी सरकार पर अंगुली इसलिए उठा रहा हूँ की यदि वाकई में सरकार इस मामले में निष्पक्ष है तो क्यों नही तुरंत सरकार ने इन दोनों हत्याओ पर एक सीबीआई जाँच के आदेश दिए और उन हत्यारों को पकड़ कर सजा दिलवाने की कोशिश की यदि सरकार ये कदम नहीं उठा रही है तो सरकार पर अंगुली उठाना स्वाभाविक है।

किसी ने आसाराम जैसे लोगो के सच को उजागर करने की कोशिश की लेकिन हमारा भ्रष्ट तंत्र और तानाशाह सरकार उस आवाज को दबाने को भरपूर कोशिश कर रही है चाहे बदले में किसी को जान ही क्यों ना लेनी पड़े।

लोगो को इस षड़यंत्र का पता नहीं लगे इसके लिए समाचार पत्रो के मुख्य पृष्ठ पर गवाह की हत्या की खबर को जगह तक नहीं मिल पायी इसी से यह साफ़ हो जाता है की कैसे तानाशाही चल रही है इस महान भारत देश में, अब यदि कल को आसाराम को सरकार निर्दोष साबित करके बरी कर देती है इसमें कोई आश्चर्य वाली बात  नहीं होगी।
जैसे बीजेपी ने सत्ता में आते ही अमित शाह को निर्दोष साबित कर दिया तो आसाराम को भी करने की कवायद तेज हो चुकी है।

जब सैया भये कोतवाल तो डर काहे का ॥

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